# आत्मनिर्भरता
बहुत शोर हो रहा है, बहुत सवाल पिके जा रहे हैं, तर्क कुतर्क सब कुछ।
मैं यह नहीं कहता कि सवाल न उठाइये, अजी उठाइये पर सोच समझकर की आपके सवाल में क्या है?
क्या हमने कभी सोचा है कि आत्मनिर्भरता क्या है? क्यों है?
या सुनते ही टूट पड़ते हैं, फेसबुकिया पोस्टो से उबाल आ गया, मोदी जी हमें विदेशी वस्तुये लेने से मना कर रहे हैं, स्वयं गंध-ग्रहण लग्जरी विदेशी वस्तुओं का इस्तेमाल कर रहे हैं।
सच मे तरस आता है बस, बहुत कुछ नहीं,
बहुत ही बुरे दौर से गुजरा अब तक उस जीवन में पर कभी भूके सोने की नौबत न आई, इसकी वजह मेरी माँ रही, जिसने मुझे बचपन से ही आत्मनिर्भरता का ये पाठ पढ़ाया, चाहे वो कयारियों में घर की रसोई के लिए सब्जी बोना हो। , उसको सींचना हो, भूसे की कमी पर भूसा न खरीद कर हरे चारे की व्यवस्था करना हो,
बिना श्रमिक लगाए गेहूं की कटाई निराई, सिचाई बुवाई आदि करना हो,
खुद आलू की बुवाई से लेकर खुदाई तक का काम अपने बल पर करके अर्थ की बचत करना हो ताकि वही अर्थ या पैसा अन्य जरूरी कामो , स्कूल फीस , किताबे, दवाई आदि में खर्च को जा सके ।
बहुत कम ऐसे काम थे जो हमने खुद न किया हो , छोटे थे समझ नही थी , मेहनत से भागते भी थे और अनाप-शनाप जिद भी करते थे । जैसे आइसक्रीम , चाट-पकौड़े आदि
पर वो जिद कभी भूल से ही पूरी की जाती थी , बाकी कितनी भी खस्ता हालत रही हो , कभी सूखी रोटी खाने को विवश न हुए ।
चूंकि सुनने की दिक्कत बचपन स ही है , माँ की बदौलत ही कभी हार न मानने का जज्बा कूट-कूट कर भरा है अभी भी, तो जब 2015 में मुम्बई आया ,मुश्किल से ही नौकरी मिली , कौन रखता कम सुनने वाले को ?
राजनीति शास्त्र से मास्टर डिग्री है , कंप्यूटर बेसिक्स और एकाउंटिंग का कोर्स भी मम्मी ने दूध बेचकर करवाया था और इसका श्रेय भी मुझे देती थी कि तुम खुद ही पढ़ रहे हो मैं तो कुछ नही करती।
इन सबके बावजूद भी 2 महीने लेबर का काम 12 घण्टे प्रतिदिन करना पड़ा , फिर अचानक कम्पनी के मालिकों में कुछ विवाद हुआ और मेरा वह काम भी छूट गया।
अब दिक्कत थी , नौकरी मिल नही रही थी, अकेले रहने की आदत थी तो सारा रूम भाड़ा खुद ही देता था। नौकरी छूटने के बाद मेरे पास कुल 10000 शेष थे , चूंकि मैं घर पर मां की बदौलत किसी भी काम मे संकोच नही करता था और जम कर मेहनत करता था तो , ऐसे ही चलते हुए एक विचार आया कि क्यों न फल की रेहड़ी लगाई जाए , और दूसरे दिन ही एक किराए का ठेला लेकर गोडाउन पहुंच गया , वहां से रोज ही 700 , 800 के केले उठाता और इंडस्ट्रियल एरिया में घुस जाता , सच मानिए मजा आ गया था ,पहले दिन ही मैंने 300 कमाए थे, ये तो लेबर बनकर जूते चाटने से बेहतर लगा मुझे,
इसे कहते हैं आत्मनिर्भरता , न कि मैं भी हुल्लड़ हड़तालों में जमा होकर नौकरी की भीख मांगता । क्या वह सही रहता??
मेरी मम्मी द्वारा घर, खेत के सारे काम हम लोगो से ही करवाने का मकसद घर का अर्थ संतुलन बनाये रखना था, ताकि अन्य मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति की जा सके,
अब मैं आइसक्रीम के लिए जिद करूँ और मम्मी मना कर दें तो क्या मैं सम्पन्नवस्था में उनके द्वारा खरीदे गए मूल्यवान सामानों की वजह से ताने देना शुरू कर दूं?
क्या यह रहेगा?
परिस्थितियों की नजाकत को समझना बहुत जरूरी है।
हम अगर खुद रोटी नहीं बनाते, खा सकते हैं तो दूसरों की जली रोटी पर सवाल उठाने का अधिकार हमारी अंतरात्मा कैसे दे सकती है?
# सूरज_शुक्ला

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