क्या आप बार बार जिंदगी में असफल हो रहे हैं? क्या आपका मन एक ही कार्य को बार बार करने से उब गया है या अब आपको जीवन में हर तरफ़ निराशा ही दिख रही है? और आप इन सबसे परेशान होकर कोई खतरनाक आत्मघाती कदम उठाने की सोच रहे हैं, तो भाई एक पल को ठहरिए इस ख्याल को थोड़ा दूर कर दीजिए और अपने कीमती वक़्त में से चंद मिनट निकाल कर इसे पढ़िए, जिसे पढ़ने के बाद आपको अपने फैसले पर अफसोस होगा और आप दुबारा अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए जुट जाएंगे।
बात शुरू करते हैं अपने पहले सवाल से, 'असफलता' कई लोग इसे एक ऐसे शब्द के रूप में देखते हैं जैसे कि किसी ने बम फोड़ दिया हो या ये कोई बेहद अपशकुन कारी शब्द हो पर मैं ये कहना चाहुँगा कि असफलता भी उतना ही महत्व रखती है जितना सफलता। ठीक उसी तरह जिस तरह पुण्य का अस्तित्व पाप की वजह से होता है। सुबह का सांझ से, हां बार बार मिलने वाली असफलता परेशान तो करती है पर वो हर बार हमें एक नई सीख दे कर जाती है। "थॉमस अल्वा एडीसन" ये नाम तो शायद हर किसी ने सुना होगा। हां ये वही शख्सियत हैं जिन्होंने बल्ब का आविष्कार किया था। उसी बल्ब का आविष्कार जिसमें वो पूरे निन्यानबे बार असफल हुए थे। वो अक्सर कहा करते थे कि उन्हें असफलता से निराशा नहीं हुई क्यूंकि उन्हें 99 ऐसे तरीके पता चले जिससे बल्ब नहीं बन सकते थे। मतलब साफ है हमें असफलतों से भागना नहीं चाहिए।
दूसरी बात हम कई बार किस्मत को कोसते हैं, उसे भला बुरा कहते हैं, यहां तक कि भगवान को भी नहीं छोड़ते। क्यूं भाई? अरे जितना वक़्त हम इन सब में लगाते हैं, उतने में हम कुछ सार्थक कर सकते हैं। 'भगवान' के भरोसे मत बैठो, क्या पता भगवान हमारे ही भरोसे बैठें हों" ये बात कहने वाले दशरथ मांझी वो व्यक्ति थे जिन्होंने एक पहाड़ को तोड कर 22 सालों में अपनी कड़ी मेहनत से उसमें से रास्ता बना लिया, जिसका उपयोग आज जन सामान्य कर रहा है तो फिर हम क्यूं हार जाएं?
अभी जो मैंने ऊपर बातें कही वो लेे जाती हैं हमें हमारे दूसरे सवाल 'खतरनाक कदम' की तरफ़? अरे भाई! आज सभी एक छोटे सी कम्पटीशन को ना निकालने पर, आत्मदाह जैसे खतरनाक कदम उठा लेते हैं पर क्या ये सही है? नहीं, क्यूंकि आपकी जिंदगी का मूल्य उस कंपटीशन से ज्यादा है, अगर दशरथ मांझी अपनी पत्नी की मौत से हार जाता तो क्या आज गहलौर में रहने वाले लोगों की जिंदगी आसान रहती? जवाब है 'नहीं'। तो अगर वो नहीं हारा तो आप क्यों हार रहे? हमेशा याद रखें की आपकी जिंदगी पर सिर्फ आपका हक नहीं, बहुत से लोग जुड़े हुए हैं। इसलिए भला इसी में है कि 'खतरनाक' कदम उठाने की बजाय छेनी हथौड़ा उठाओ और संवार लो अपनी जिंदगी( अरे कहीं सही में छेनी हथौड़ा मत उठा लेना) मतलब की मेहनत की एक अलख जगाओ और जुट जाओ अपने पथ पर क्यूंकि 'कामयाबी' सबको मिलती है, जरूरत बस धैर्य पूर्वक मेहनत और लगन की है।
तो इसी के साथ मैं यहां अपनी बातों को विराम देता हूं, बताइएगा कैसा रहा ये लेख? फिर मिलते हैं आपसे अगली बार कुछ और नए तथ्यों और ऐसे ही मोटिवेशनल लेख के साथ। कोई सवाल अगर हो दिल में तो पूछिए उसे नीचे कमेंट बॉक्स में। तब तक के लिए आपको प्यार भरा नमस्कार।
---रितेश कुमार जायसवाल

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